१२ ज्योतिर्लिंग उनका इतिहास एवं १२ ज्योतिर्लिंग कथाएं

  • सोमनाथ ज्योतिर्लिंग( somnath jyotirling) 
  •  मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग (mallikarjun jyotirling) 
  • महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग (mahakaleswar jyotirling) 
  • ओम्कारेश्वर ज्योतिर्लिंग omkareswar jyotirling) 
  • केदारनाथ ज्योतिर्लिंग(kedarnath jyotirling) 
  •  भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग (bheemashankar jyotirling) 
  • काशी विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग(kashi vishwanath jyotirling) 
  •  त्रंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग(trayambkeswar jyotirling) 
  •  वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग (vaidhyanath jyotirling) 
  • नागेश्वर ज्योतिर्लिंग (nageswar jyotirling) 
  • रामेश्वरम ज्योतिर्लिंग (rameshwaram jyotirling) 
  • घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग(ghrshneswar jyotirling) 

सोमनाथ ज्योतिर्लिंग

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12 ज्योतिर्लिंगों में सर्वश्रेष्ठ सोमनाथ ज्योतिर्लिंग चंद्र देव के द्वारा निर्मित किया गया शिवजी का शिव लिंग है| यह मंदिर भारत के इतिहास में एक अत्यंत महत्वपूर्ण मंदिर के रूप में विख्यात है सोमनाथ मंदिर को 12 ज्योतिर्लिंगों में सर्वप्रथम ज्योतिर्लिंग के रूप में माना जाता है इस मंदिर के बारे में वेदों में सबसे प्राचीन “ऋग्वेद” में भी लिखा गया है| 

यह मंदिर अत्यंत वैभवशाली है और इतिहास में प्राचीन मंदिर का बाहरी आक्रमणों की वजह से नुकसान हुआ है और इसे कई बार पुनः निर्मित भी किया गया वर्तमान में दिसंबर 1995 को भारत के राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा जी ने राष्ट्र को समर्पित किया था| 

सोमनाथ की कथाएं एवं इतिहास 

प्राचीन कथाओं के अनुसार यहां पर चंद्रदेव ने दक्ष प्रजापति के श्राप से मुक्ति पाने के लिए शिवजी की विशेष आराधना की थी उनकी आराधना से प्रसन्न होकर शिव जी ने उनको श्राप से मुक्त किया था इसलिए इस मंदिर का नाम सोमनाथ पड़ गया| 

एक अन्य कथानक के अनुसार श्री कृष्ण जी ने भी अपना देह त्याग यहीं पर किया था|  श्री कृष्ण बालूका तीर्थ पर विश्राम करते समय शिकारी के द्वारा तीर लग जाने के कारण अपने प्राण को त्याग दिया था यह स्थान पर वर्तमान में बहुत ही भव्य श्री कृष्ण मंदिर बना हुआ है| 

 वर्तमान समय में यह मंदिर अत्यंत भव्य दिखता है इस मंदिर को तीन प्रमुख भागों में विभाजित किया गया है इस मंदिर की ऊंचाई 150 फुट के आसपास है और इसे आखरी दक्षिणी छोर भी माना जाता है यह स्थान हमारे प्राचीन ज्ञान और सूझबूझ का एक अद्भुत साक्ष्य  माना जाता है

सोमनाथ मंदिर कहां स्थित है?

यह मंदिर वेरावल बंदरगाह में सौराष्ट्र क्षेत्र गुजरात राज्य में स्थित है यह मंदिर सदियों पुराना होने के साथ-साथ अत्यंत पौराणिक और प्राचीन कथाओं को अपनी ओर समेटे हुए हैं| यह मंदिर शिव भक्तों की आस्था का बहुत बड़ा केंद्र है |सोमनाथ  मंदिर तीन प्रमुख नदियों के संगम स्थल पर बना हुआ है जहां पर स्नान करके पूजन करने से विशेष शिव कृपा प्राप्त होती है| 

 सोमनाथ ज्योतिर्लिंग के पास के पर्यटन स्थल

 सोमनाथ ज्योतिर्लिंग के पास के प्रमुख पर्यटन स्थलों में यादव स्थली, अहिल्याबाई देवी का मंदिर, आदि प्रमुख पर्यटन केंद्र हैं| 

सोमनाथ ज्योतिर्लिंग कैसे पहुंचे?

रेल मार्ग से सोमनाथ ज्योतिर्लिंग आने के लिए सबसे निकटतम रेलवे स्टेशन वेरावल रेलवे स्टेशन है जो मंदिर से केवल 7 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है यह रेल मार्ग अहमदाबाद गुजरात के अन्य रेलवे मार्ग से सीधी तौर पर जुड़ा हुआ है

वायु मार्ग से सोमनाथ आने के लिए निकटतम हवाई अड्डा के शॉट हवाई अड्डा है जो सोमनाथ से 55 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है यह हवाई अड्डा मुंबई से जुड़ा हुआ है आपको हवाई अड्डे से बाहर प्राइवेट कभी आप बस के द्वारा आप सोमनाथ पहुंच सकते हैं

सड़क परिवहन से सोमनाथ ज्योतिर्लिंग आने के लिए आपको वेरावल आना पड़ेगा वेरावल से भावनगर 266 किलोमीटर जूनागढ़ 85 किलोमीटर और पोरबंदर 122 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है यह राज्य के सभी क्षेत्रों से आसानी से बस सेवा के द्वारा जुड़ा हुआ है

सोमनाथ मंदिर में कहां रुके

सोमनाथ ज्योतिर्लिंग के दर्शन करने के लिए हमेशा लाखों की संख्या में भक्तगण आते रहते हैं इसकी प्राचीनता और महानता से आकर्षित होकर देश विदेश से पर्यटक भी आते हैं|

यहां पर विश्राम के लिए तीर्थयात्रियों के लिए विशेष प्रकार के बनाए हुए गेस्ट हाउस, विश्राम साला और धर्मशाला की व्यवस्था उपलब्ध है इसके अलावा यहां पर लग्जरी होटल्स भी उपलब्ध हैं इसके साथ-साथ वेरावल जो कि यहां से 7 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है वहां पर भी रुकने की व्यवस्था उपलब्ध है| 


मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग

यह भव्य मंदिर श्री मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग के नाम से विश्व विख्यात है इस स्थान को दक्षिण का कैलाश भी कहा जाता है| यह श्री शैल पर्वत पर स्थित है अनेक धर्म ग्रंथों में इस स्थान की महिमा का वर्णन किया जाता है| 

महाभारत के अनुसार श्रीशैलम पर्वत पर स्थित यह मंदिर में विशेष पूजन अर्चन करने से अश्वमेध यज्ञ करने का भी फल प्राप्त होता है कई ग्रंथों में तो यहां तक लिखा है कि शहर के शिखर के दर्शन मात्र से ही सभी कष्टों से मुक्ति हो जाती है और अनंत सुख की प्राप्ति होने लगती है| 

मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग कहां स्थित है ?

मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग भारत के आंध्र प्रदेश राज्य में दक्षिण दिशा की तरफ श्रीशैलम  पर्वत पर कृष्णा नदी के किनारे स्थित है यह भगवान के प्रमुख ज्योतिर्लिंगों में से दूसरे स्थान पर स्थित है यह मंदिर हिंदू धर्म और संस्कृति के लिए एक बहुत बड़ा स्थान है यहां पर दर्शन के लिए बहुत दूर-दूर से पर्यटक आते हैं| 

मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग की कथाएं एवं स्थापना 

मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग के विषय में कहा जाता है कि की इसका इतिहास शिव परिवार से जुड़ा हुआ है
ऐसा माना जाता है कि भगवान शिव के दोनों पुत्र गणेश जी और कार्तिकेय जी में पहले विवाह करने की होड़ मच गई  गणेश जी अपने बड़े भाई कार्तिकेय जिसे पहले विवाह करना चाहते थे परंतु कार्तिकेय जी अपना विवाह पहले करना चाहते थे इसी समस्या का समाधान करने के लिए वे दोनों लोग भगवान शिव और पार्वती जी के पास गए तो भगवान शिव और पार्वती जी ने उन्हें आदेश दिया कि जो संपूर्ण ब्रह्मांड का सबसे पहले परिक्रमा कर कर आएगा उसका विवाह पहले कर दिया जाएगा| 

यह सुनते ही कार्तिकेय जी अत्यंत तीव्र गति से ब्रह्मांड की परिक्रमा करने के लिए प्रस्थान कर दिए परंतु गणेश जी शरीर से स्थूल होने के कारण अत्यंत तीव्र गति से नहीं जा सकते थे क्योंकि उनका सवारी मूषक था जो पूरे ब्रह्मांड की परिक्रमा करने में काफी समय लगा सकता था परंतु गणेश जी बुद्धि के सागर थे उन्होंने भगवान शिव और पार्वती जी को एक स्थान पर बैठने के लिए कहा और अपने माता-पिता की सात बार परिक्रमा की और पूरे ब्रह्मांड का भ्रमण करने का सौभाग्य प्राप्त कर लिया तो इस प्रकार गणेश जी का विवाह रिद्धि सिद्धि के साथ कर दिया गया

जब कार्तिकेय जी सारा ब्रह्मांड की परिक्रमा कर वापस आए तब तक गणेश जी के 2 पुत्र भी हो चुके थे इससे कार्तिकेय जी को अत्यंत पीड़ा हुई वह अपने माता पिता को प्रणाम कर इस स्थान पर आकर रहने लगे|  

पर्वत पर अपना निवास बनाकर वह यहां पर रहने लगे उनके मनाने के सारे प्रयास विफल हो गए तो भगवान शिव और पार्वती जी स्वयं यहां पर आकर प्रकट हुए परंतु उनके प्रकट होने से पहले ही कार्तिकेय जी ने इस स्थान को छोड़ दियाउसके बाद स्क्रंच पर्वत पर ही भगवान शिव और पार्वती जी ज्योतिर्लिंग के रूप में प्रकट हो गए| 

“मल्लिका” का तात्पर्य पार्वती जी से लिया जाता है जबकि “अर्जुन” का अर्थ भगवान शिव से है इस प्रकार यह मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग के रूप में विश्व विख्यात हुआ| 

मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग के आसपास के पर्यटन स्थल 

 मल्लिकार्जुन के पास के प्रमुख पर्यटन स्थलों में श्री शैलम, देवस्थानम, मल्लिका अर्जुन खड़के, मल्लिका अर्जुन राय, मल्लिकार्जुन भी मानसून आदि प्रमुख है

मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग कैसे पहुंचे ?

हवाई मार्ग से मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग पहुंचने के लिए आपको निकटतम हवाई अड्डा बेगमपेट हवाई अड्डा जाना पड़ेगा यहां से आप स्थानीय साधनों की बस टैक्सी प्राइवेट कैंप के आदमी साधनों से यहां पहुंच सकते हैं

रेल द्वारा मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग पहुंचने के लिए आपको निकटतम रेलवे स्टेशन मारकापुर रेलवे स्टेशन है मलकापुर रेलवे स्टेशन से आप स्थानीय साधनों की मदद से अपने स्थान तक जा सकते हैं

मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग चारों तरफ से सड़क मार्ग से जुड़ा हुआ है यहां आप आसानी से सभी प्रमुख शहरों से आ सकते हैं| 

मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग दर्शन करने का सबसे अच्छा समय

यूं तो वर्ष भर यहां पर भक्तों की भीड़ लगी रहती है परंतु विशेषकर सावन मास में शिव जी के भक्त यहां पर अधिक संख्या में आते हैं विदेशी और स्थानीय पर्यटक यहां आने के लिए सबसे अच्छा समय नवंबर से लेकर मार्च तक का माना जाता है क्योंकि यहां पर सर्दी कुछ कम होती है जिसके कारण इस यात्रा का आनंद उठा सकते हैं| 


महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग

“धरती का स्वर्ग” कहे जाने वाले उज्जैन नगरी में महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग स्थापित है यह प्राचीन ज्योतिर्लिंग 12 प्रमुख ज्योतिर्लिंग में तीसरे स्थान पर माना जाता है महाकालेश्वर भगवान शिव का प्रमुख मंदिर है महाकाल ज्योतिर्लिंग को “कालों का काल” माना जाता है सावन महीने में यहां पर शिव भक्तों की लाखों की संख्या में डोलिया आती हैं| 

मध्य प्रदेश के शिप्रा नदी तट पर बसाया सुंदर और भव्य मंदिर भारत के परम पवित्र स्थलों में से एक है इस पवित्र स्थल की विवेचना महाभारत, शिव पुराण, स्कंद पुराण ,आदि में भी विस्तृत रूप से की गई है|

महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग का इतिहास एवं कथाएं 

महाकालेश्वर की कहानियां और इतिहास अत्यंत प्राचीन है उन प्राचीन कहानियों में यह कहा जाता है कि इस राज्य का प्राचीन नाम उज्जैनी था जिसके राजा राजा चंद्रसेन थे वह एक परम शिव भक्त थे और शिव की महिमा में ही लगे रहते थे| 

एक बार राजा के मित्र मणिभद्र ने राजा चंद्रसेन को एक चिंतामणि प्रदान की जो कि बहुत ही भव्य और तेजस्वी थी इस मणि को धारण करते ही राजा चंद्रसेन की कीर्ति चारों दिशाओं में फैलने लगी| 

इसको सुनकर देश विदेश के राजाओ ने भी इस मणि को हासिल करने के लिए राजा चंद्रसेन पर आक्रमण कर दिया | इस आक्रमण से आहत हो कर राजा चंद्रसेन ने शिव की आराधना के लिए एक गुप्त स्थान पर छुप गए और वहीं पर शिव की आराधना में लीन हो गए शिव की आराधना में लीन रहने के पश्चात राजा चंद्रसेन भक्ति में ध्यान लगा दिया| 

एक बार राजा चंद्रसेन जब शिव भक्ति में पूजन कार्यों में लगे हुए थे उसी समय एक गोपी विधवा अपने छोटे से बालक के साथ वहां आई उस बालक ने जब राजा चंद्र सिंह को विशेष पूजन अर्चन करते हुए देखा तो वह भी उससे अत्यंत प्रेरित हो गया

 उसी प्रकार  पत्थर पर शिव की आराधना करने लगा और शिव की आराधना में इतना बिजी हो गया कि अपनी माता के बार-बार बुलाने पर भी वह नहीं सुना इससे माता क्रोधित हो गयी और उसे उसके शिला उठाकर उन्होंने फेंक दिया |

ऐसा देखकर बालक वही जोर जोर से रोने लगा और रोते रोते वह बेहोश हो गया | परंतु कुछ समय बाद वह होश में जब आया तो उसने देखा कि वह शिला के स्थान पर एक भव्य मंदिर बना हुआ है उस भव्य मंदिर के गर्भ में एक विशाल शिवलिंग है जो सूर्य के समान और उससे  भी ज्यादा चमक रहा था |

मंदिर के मध्य में उस बालक की पूजा की सामग्री सुसज्जित रूप से रखी हुई थी यह सब देखकर माता माता आश्चर्यचकित हो गई और अपने बालक को गले लगा लिया |

राजा चंद्रसेन समाचार प्राप्त हुआ तो वह भी उस बालक से मिलने वहां पहुंचे बालक की गोद में ही भगवान हनुमान जी प्रकट हुए और वहां पर उन सभी लोगों को संबोधित किया

और उस बालक के बारे में बताया कि यह बालक आगे चलकर महा विद्वान होगा और महाकाल के आगे सभी लोग तुच्छ हैं और महाकाल की भक्ति सबको करनी चाहिए| 

तब से यह महाकाल की  उज्जैन नगरी कही जाती है और यहां पर महाकाल की पूजन अर्चन किया जाता है| 

महाकाल के भक्तो के सभी कष्टों का निवारण होता है ऐसा यहां के भक्त लोग कहते हैं और उन्हें इसका नियमित तौर पर प्रमाण मिलते रहते हैं| 

महाकाल की भस्म आरती

 भारत के सभी ज्योतिर्लिंग महाकाल की आरती भस्म के द्वारा की जाती है यह आरती प्रातः 4:30 बजे होती है जिसकी बुकिंग लगभग महीने भर पहले से ही की जाती है| 

यह भस्म आरती का साक्छी बनने के लिए देश-विदेश से लोग अपनी बुकिंग कराते हैं कहा जाता है कि इस आरती में जो भी सम्मिलित होता है उसके सारे दुख और कष्ट का निवारण हो जाता है| 

उज्जैन महाकाल ज्योतिर्लिंग के आसपास के पर्यटन स्थल

महाकाल के समीप  के प्रमुख पर्यटन स्थलों में हरसिद्धि देवी का मंदिर, शिप्रा घाट, गोपाल मंदिर, गढ़ कालिका देवी मंदिर, भरतरी गुफा, काल भैरव मंदिर, बड़े गणेश मंदिर, और महाकालेश्वर मंदिर आदि प्रमुख है| 

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उज्जैन महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग कैसे पहुंचे ?

वायु मार्ग से उज्जैन महाकाल ज्योतिर्लिंग आने के लिए सबसे नजदीकी एयरपोर्ट इंदौर है जो कि करीब यहां से 59 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है एयरपोर्ट के बाहर से आप प्राइवेट क्या पिया लोकल सड़क माध्यम से ही उज्जैन पहुंच सकते हैं| 

उज्जैन रेलवे स्टेशन से रेल मार्ग द्वारा आप विभिन्न बड़े शहरों जैसे दिल्ली मुंबई कोलकाता आदि से सीधी ट्रेनें उपलब्ध है| 

सड़क मार्ग से उज्जैन आने के लिए लगभग सभी शहरों से सीधी बस सेवा उपलब्ध है या नेशनल हाईवे 48 और नेशनल हाईवे 52 से जुड़ा हुआ है| 

उज्जैन आने का सबसे अच्छा समय

यूं तो वर्ष भर उज्जैन ज्योतिर्लिंग के दर्शन करने के लिए हजारों की संख्या में भक्त यहां पहुंचते हैं परंतु यहां पर सावन के महीने में विशेष पूजन अर्चन के कारण यहां पर सावन पर अत्यधिक संख्या में भक्तों की भीड़ हो जाती है| 

आपको अगर भक्तों को भक्ति में होते हुए देखना है तो सावन में आना विशेष शुभ होता है सावन के महीने में यहां का टेंपरेचर लगभग 20 से 30 डिग्री सेंटीग्रेड के आसपास होता है| 

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ओम्कारेश्वर ज्योतिर्लिंग

ओम्कारेश्वर ज्योतिर्लिंग जो कि मध्य प्रदेश में स्थित है यह 12 ज्योतिर्लिंगों में से चौथे स्थान पर आता है इस ओमकारेश्वर का निर्माण नर्मदा नदी से प्राकर्तिक तौर पर हुआ है|  यह मंदिर अति प्राचीन है इस मंदिर में 68 तीर्थ स्थान है जहां पर 33 कोटि देवता अपने परिवार सहित निवास करते हैं |

ओमकारेश्वर में दो ज्योति स्वरूप लिंगो सहित 108 प्रभावशाली शिवलिंग है आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि मध्यप्रदेश में प्रसिद्ध 12 ज्योतिर्लिंगों में से 2 ज्योतिर्लिंग स्थित है| 

ओमकारेश्वर मंदिर का इतिहास और प्राचीन मान्यताएं

पवित्र नर्मदा नदी के तट पर स्थित यह ज्योतिर्लिंग अत्यंत पवित्र और प्राचीन है| यह माना जाता है कि कोई भी तीर्थयात्री देश में चाहे जहां भी तीर्थ यात्रा कर ले परंतु जब तक वह ओम्कारेश्वर ज्योतिर्लिंग पर जल नहीं चढ़ाता  तब तक उसके तीर्थ अधूरे माने जाते हैं| 

इसी प्रकार नर्मदा नदी के विषय में कहा जाता है कि यमुना जी में 15 दिन का स्नान और गंगा जी में 7 दिन का स्नान का जो पुन्य प्राप्त होता है वह सिर्फ नर्मदा नदी जी के दर्शन से ही प्राप्त हो जाता है| 

ओमकारेश्वर तीर्थ स्थल में 24 अवतार उपलब्ध है यह सभी दर्शनीय मंदिर के रूप में विराजमान है| 

ओम्कारेश्वर ज्योतिर्लिंग का इतिहास एवं कथाएं 

मंदिर के इतिहास के विषय में कहा जाता है कि इसे शिवभक्त कुबेर ने स्थापित किया था यहां पर कुबेर जी ने शिवजी की घनघोर तपस्या की थी जिससे प्रसन्न होकर शिवजी ने देवताओं को धनपति होने का वरदान दिया था| 

कुबेर जी के स्नान के लिए शिवजी ने अपनी जटा के बाल से कावेरी नदी उत्पन्न की थी यही नदी मंदिर के बगल से बहकर  नर्मदा जी से मिलती है |

धनतेरस पूजन पर भी इस मंदिर का विशेष महत्व है दिवाली की रात को यहां पर जल चढ़ाने का विशेष महत्व है पूजन अर्चन के विषय में यह कहा जाता है कि यहां पर ज्वार चढ़ाने से घर में सुख समृद्धि की प्राप्ति होती है

ओम्कारेश्वर ज्योतिर्लिंग के दर्शन

जहां पर ओम्कारेश्वर ज्योतिर्लिंग स्थित है उसे विष्णुपुरी कहा जाता है|  नर्मदा नदी के तट पर आप नौका के द्वारा नर्मदा नदी को पार कर के उस तरफ जाते हैं उस उस तरफ भी नर्मदा नदी पर पक्का घाट बना हुआ है | 

घाट के ऊपर ही कुछ दूरी पर यह ज्योतिर्लिंग विराजमान है|  यहां स्नान करने के बाद ओमकारेश्वर दर्शन के लिए भक्त लोग यहां से कुछ दूरी पर चलते हैं मंदिर में पहुंचने पर गणेश जी की मूर्ति है शिवलिंग के चारों ओर जल भरा रहता है| 

इस ज्योतिर्लिंग में 5 मंजिला मंदिर है इन 5 मंजिलो में अलग-अलग शिवलिंग विराजमान है यह तर्क है कि ओमकारेश्वर की परिक्रमा करने में ही रामेश्वरम तथा गौरी सोमनाथ के दर्शन हो जाते हैं| 

यहां ओम्कारेश्वर ज्योतिर्लिंग के दर्शन करने वाले भक्तों को विशेष 3 दिन के लिए यहां आना पड़ता है यहां के संपूर्ण तीर्थ स्थलों के भ्रमण के लिए कम से कम 3 दिन का समय आवश्यक होता है 3 दिन में ही शिव की परिक्रमा पूरी मानी जाती है| 

ओम्कारेश्वर ज्योतिर्लिंग के समीप के प्रमुख पर्यटन स्थल

ओम्कारेश्वर ज्योतिर्लिंग के समीप कई प्रमुख पर्यटन स्थल हैं जिनमें सैलानी आईलैंड हनुवंतिया रिसोर्ट, दादा जी का धाम, सिधवरकुट, जैन तीर्थ, महेश्वर मंदिर, बुरहानपुर, आदि प्रमुख स्थल है| 

ओम्कारेश्वर ज्योतिर्लिंग कैसे पहुंचे ?

हवाई मार्ग से ओमकारेश्वर पहुंचने के लिए सबसे निकटतम हवाई अड्डा इंदौर है जो कि यहां से लगभग 77 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है और यह लगभग पूरे भारत से जुड़ा हुआ है

रेल मार्ग के द्वारा अगर आप ओम्कारेश्वर ज्योतिर्लिंग पहुंचना चाहते हैं तो सबसे निकटतम रेलवे स्टेशन मोर्तक्का है या खंडवा रतलाम रेल मार्ग पर स्थित है ओम्कारेश्वर ज्योतिर्लिंग से इस स्टेशन की दूरी 12 किलोमीटर की है

सड़क मार्ग से आप ओमकारेश्वर अगर आना चाहते हैं तो यह सड़क मार्ग के द्वारा इंदौर खंडवा उज्जैन से बहुत अच्छी तरह से जुड़ा हुआ है जहां पर सड़क के डबल लेन है और आप आसानी से यहां आ सकते हैं

ओमकारेश्वर में कहां रुके ?

ओम्कारेश्वर ज्योतिर्लिंग में दर्शन करने के लिए आपको कम से कम 3 दिन का समय होना चाहिए 3 दिन की परिक्रमा से ही संपूर्ण ओमकारेश्वर के दर्शन हो जाते हैं|  इसके लिए आपको यहां पर विभिन्न प्रकार के सस्ते और लग्जरी होटल मिल जाएंगे इसके अलावा यहां पर 60 से अधिक धर्मशालाएं भी है जहां पर भक्त और पर्यटक आकर आसानी से रह सकते हैं|


केदारनाथ ज्योतिर्लिंग

केदारनाथ ज्योतिर्लिंग प्रमुख 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक है यह ज्योतिर्लिंग अपने आप में अत्यंत अनूठा है इसकी कथाएं अत्यंत रोचक है यहां का पर्यावरण प्रतिकूल होने के कारण यह केवल 6 महीने के लिए ही भक्तों के लिए खोला जाता है बाकी 6 महीने यह बंद रहता है इस भव्य मंदिर का निर्माण क्यूरी शैली से किया गया है यहां स्थित शिवलिंग अत्यंत प्राचीन है| 

केदारनाथ ज्योतिर्लिंग कहां स्थित है?

केदारनाथ ज्योतिर्लिंग उत्तराखंड राज्य के रुद्रप्रयाग जिले में स्थित है यह हिमालय की पर्वत की चोटियों पर स्थित है इसे 12 ज्योतिर्लिंग में प्रमुख स्थान दिया गया है इसके साथ ही है चारधाम और पंच केदार के रूप में भी विश्व विख्यात है| 

मंदिर का इतिहास एवं कथाएं

केदारनाथ ज्योतिर्लिंग का इतिहास अत्यंत प्राचीन है यह  पांडवों से जुड़ी हुई ज्योतिर्लिंग है कहा जाता है कि इस मंदिर का निर्माण पांडव वंश के राजा जन्मेजय ने कराया था |

यहां स्थित स्वयंभू शिवलिंग अति प्राचीन है इस मंदिर का जीर्णोद्धार आदि शंकराचार्य ने भी कराया है

एक लोक कथा के अनुसार इस ज्योतिर्लिंग की स्थापना महत्वपूर्ण नर और नारायण ऋषि के तपस्या के फलस्वरूप हुई थी उनकी आराधना से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने यहां पर ज्योतिर्लिंग के रूप में निवास करने का वरदान दिया था यह स्थल पर्वतराज हिमालय के केदार नामक श्रृंग पर अवस्थित है| 

एक अन्य कथा के अनुसार महाभारत के युद्ध में विजय होने के पश्चात सभी पांडव अपने भ्रातृ  हत्या से मुक्ति पाने के लिए वह भगवान शिव की आराधना करके आशीर्वाद पाना चाहते थे

परंतु भगवान शिव उनसे रुष्ट थे जब वह भगवान शिव के दर्शन के लिए केदार पहुंचे तो वहां पर भगवान शिव बैल के रूप में जानवरों के बीच जाकर छिप गए| 

परंतु भीम ने उन्हें पहचान लिया और अपना विशाल रूप अख्तियार कर लिया और दो पर्वतों के मध्य अपना पैर रख दिया अन्य जानवर सभी जानवरों के पैरों के बीच से निकल गए जबकि भगवान शिव नहीं गए इससे उनको बैल के पीठ पर भीम ने हाथ रख दिया और उनको पकड़ना चाहा इस प्रकार भगवान शिव  भूमि में अंतर्ध्यान हो गए तब भीम ने त्रिकोण आकार पीठ को पकड़े रहा

यह देखकर भगवान शिव केदारनाथ  पांडवों की भक्ति से प्रसन्न हो गए और उनको भ्रात हत्या के पाप से मुक्त कर दिया| 

केदारनाथ जी का दर्शन का समय

केदारनाथ ज्योतिर्लिंग के मंदिर में आम दर्शनार्थियों के लिए प्रातः 6:00 बजे खुल जाता है

इसके बाद पुनः  शाम को 5:00 बजे जनता के दर्शन हेतु मंदिर खोला जाता है इसके बीच में दोपहर 3:00 से 5:00 तक विशेष पूजा-अर्चना होती है

भगवान केदारनाथ का मंदिर 6 महीने तक बर्फ से ढका रहता है बर्फ कम होने पर इसके कपाट खोलने के विधिवत मुहूर्त निकाला जाता है परंतु यह नवंबर से लेकर अप्रैल तक बंद रहता है इसके पश्चात ही या कपाट दर्शनों के लिए खोले जाते हैं| 

इन छह महीनों के लिए केदारनाथ की पंचमुखी प्रतिमा को उखीमठ में लाया जाता है इस प्रतिमा की पूजा यहां भी रावल जी ही विशेष माध्यमों से करते हैं| 

पूजा अर्चना करने के लिए केदारनाथ ज्योतिर्लिंग में केदारनाथ की जनता शुल्क जमा कराकर रसीद प्राप्त कराती  है इसके अनुसार ही वह मंदिर की पूजा अर्चना करवाती  है| 

केदारनाथ ज्योतिर्लिंग के पास के पर्यटन स्थल

त्रियुगीनारायण

यह वह स्थान है जहां पर पौराणिक कथाओं के अनुसार भगवान शिव और पार्वती जी का विवाह संपन्न हुआ था |

यह स्थान सोनप्रयाग से 5 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है सनातन ज्योतिष के बारे में कहा जाता है कि ज्योति विवाह का गवाह थी आज भी मंदिर के सामने निरंतर रूप से जलती रहती है| 

गुप्तकाशी
यह स्थान अर्धनारीश्वर भगवान और विश्वनाथ जी भगवान के मंदिरों के लिए प्रसिद्ध है

चोपता झील

 हिमालय पर्वत श्रंखला के पास में स्थित सबसे मनमोहक दृश्य में से एक है समुद्र तल से इसकी ऊंचाई लगभग ढाई सौ मीटर और गोपेश्वर से 40 किलोमीटर दूर पर स्थित यह दर्शनीय पर्यटन स्थल है| 

देवरिया ताल

यह मनोरम ताल हिमालय में भगवान शिव के मंदिर से कुछ दूरी पर स्थित है सुबह के समय झील के पानी पर बर्फ की चादर ढक जाती है और उस पर कल कल करते जानवर पंछियों को देखना एक अद्भुत नजारा होता है| 

पंच केदार

पंच केदार केदारनाथ में स्थित पांच महादेव मंदिरों में महत्वपूर्ण मंदिर है इसे पंच केदार के नाम से जाना जाता है केदारनाथ महेश्वर तुंगनाथ रुद्रनाथ कल्पेश्वर गढ़वाल आदि मंदिर यहां स्थित है| 

चंद्रशिला

यह एक खूबसूरत ट्रैकिंग स्थल है चंद्रशिला तुंगनाथ से लगभग 130 किलोमीटर दूरी पर स्थित है| 

अगस्त मुनि

अगस्त मुनि एक छोटा सा कस्बा है इस क्षेत्र का नाम महर्षि अगस्त के नाम पर पड़ा जहां पर इन्होंने आकर वर्षों तक तपस्या की थी| 

कालीमठ

कालीमठ गढ़वाल का एक सुप्रसिद्ध तीर्थ स्थान है यह मां काली को समर्पित है यहां पर एक भव्य मंदिर बना हुआ है जिसके बगल में धवल नदी बहती है| 

केदार पर्वतमाला

यह पर्वतमाला तीन प्रमुख पर्वतों गुंबद बार थे कुंड और केदार से मिलकर बनी हुई है यह एक लंबे और खतरनाक सोलन से ग्रस्त चोटी से केदार नाथ से जुड़ा हुआ है| 

केदारनाथ कैसे पहुंचे ?

12 ज्योतिर्लिंग में प्रमुख ज्योतिर्लिंग होने के कारण आप यहां हवाई सड़क एवं रेल परिवहन के द्वारा आसानी से पहुंच सकते हैं

हवाई मार्ग से यहां आने के लिए सबसे निकटतम हवाई अड्डा देहरादून है जो केदारनाथ से 240 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है| 

रेल मार्ग से केदारनाथ ज्योतिर्लिंग आने के लिए सबसे निकटतम रेलवे स्टेशन ऋषिकेश है यहां से आप केदारनाथ के लिए प्राइवेट कैब और कार के माध्यम से जा सकते हैं| 

सड़क माध्यम से जाने के लिए केदारनाथ दिल्ली ऋषिकेश हरिद्वार देहरादून किस से आसानी से जुड़ा हुआ है दिल्ली से हरिद्वार आप 8 से 9 घंटे में पहुंच जाएंगे इसके अलावा ऋषिकेश और हरिद्वार के लिए दिल्ली से हर आधे घंटे में सीधे बस सेवा उपलब्ध है| 


भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग

12 प्रमुख ज्योतिर्लिंगों में से भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग भी अत्यंत प्राचीन और प्रमुख है यह ज्योतिर्लिंग भक्तों की मनोकामना पूर्ण करने वाला माना जाता है| 

इस प्राचीन ज्योतिर्लिंग का वर्णन शिवपुराण में भी मिलता है महाराष्ट्र राज्य में पुणे से करीब 100 किलोमीटर दूर यह मंदिर भक्तों की आस्था का प्रमुख केंद्र है| 

3250 फीट की ऊंचाई पर स्थित यह मंदिर मोटेश्वर महादेव के नाम से भी जाना जाता है क्योंकि इसका शिवलिंग का आकार काफी मोटा है इसके समीप से ही भीमा नामक एक नदी बहती है जो कृष्णा नदी में जाकर मिलती है| 

भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग कहां स्थित है ?

भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग महाराष्ट्र राज्य में सहयाद्री पर्वत पर भोरगिरी गांव में स्थित है इसके समीप ही भीमा नदी बहती है यह पुणे से 110 किलोमीटर दूर स्थित है| 

भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग का इतिहास और कथाएं

शिवपुराण की कथा के अनुसार कुंभकरण का पुत्र भीम जोकि अत्यंत बलशाली था उसका जन्म अपने पिता की मृत्यु के ठीक पहले हुआ परंतु जब उसे जब जानकारी प्राप्त हुई कि वह उसका उसके पिता का वध भगवान राम के हाथों हुआ था

तो उनका वध करने को लालायित हो उठे इसके लिए उसने ब्रह्मा जी की कठोर साधना की ब्रह्मा जी उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर उसे वरदान दे दिया |

इसके पश्चात व निरंकुश हो गया उसने कई देवताओं को युद्ध में हरा दिया और पूजा-पाठ आदि बंद करा दिए जिस से आहत होकर सभी देवता भगवान शिव के पास पहुंचे भगवान शिव ने उन सब को आश्वासन दिया कि वह इसका कोई हल निकालेंगे| 

इसके पश्चात भगवान शिव ने भीम को युद्ध के लिए ललकारा भयंकर युद्ध में भीम मारा गया और इस प्रकार देवताओं और असुरों को भीम के मारे जाने से यज्ञ आदि करने की आजादी मिल गई |

सभी देवताओं ने भगवान शिव से निवेदन किया कि वह यहां पर ज्योतिर्लिंग के रूप में विराजमान हो इन सभी देवताओं के आह्वान पर भगवान शिव यहां पर भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग के रूप में विद्यमान हुए |

भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग के पास के प्रमुख पर्यटन स्थल 

पुणे में भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग अत्यंत प्रचलित और प्रसिद्ध है इसके अलावा यहां देश और विदेशों से भी शिव भक्त नियमित तौर पर आते हैं भीमाशंकर की एक सबसे बड़ी विशेषता यहां पर एक बहुत बड़ा घंटा है| 

अगर आप भीमाशंकर दर्शन को जाएंगे इसके अलावा आपको हनुमान जी भीमा नदी नागफनी मुंबई पॉइंट साक्षी मीना जैसे स्थानों का भी भ्रमण करने का मौका मिल जाएगा इसके अलावा धार्मिक स्थलों के अलावा भी वन्यजीव प्रेमियों के लिए अत्यंत सुंदर जगह है |

यहां पर भीम शंकर लाल वन क्षेत्र वन्य जीव अभ्यारण लायन सफारी के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण है दुनिया भर के लोग इस वन्य छेत्र में घूमने आते रहते है | 

भीमाशंकर मंदिर जाने का सबसे अच्छा समय

भीमाशंकर यों तो वर्ष भर यहां पर भक्त आते रहते हैं परंतु सबसे अच्छा यहां आने का समय गर्मियों को छोड़कर आप कभी भी (सितम्बर से लेकर मार्च) तक आ सकते हैं वन्यजीव प्रेमी यहां पर वर्षा को छोड़कर कभी भी आते हैं |

भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग के पास के प्रमुख पर्यटन स्थल  

भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग के पास के प्रमुख पर्यटन स्थलों में भीमाशंकर वन्य जीव अभ्यारण भीमाशंकर में ट्रेकिंग की जाती है| 

इसके अलावा हनुमान वाटरफॉल, गुप्त भीमाशंकर मंदिर, सहयाद्री वन्य जीव अभ्यारण, शिवनेरी किला पुणे ,आगा खां पैलेस, पार्वती हिल, राजगढ़ का किला, एंप्रेस गार्डन, पेशवा उद्यान चिड़ियाघर ,लाल महल पुणे ,सिंह गढ़ किला पूरे पश्चिमी घाट पुणे ,आदि प्रमुख रूप से है |

जहां पर पर्यटक भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग के दर्शन करने के बाद यहां घूमने आते हैं|

भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग कैसे पहुंचे ?

हवाई मार्ग से भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग आने के लिए सबसे निकटतम हवाई अड्डा पुणे हैं जो कि यहां से लगभग 110 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है हवाई अड्डे के बाहर से आप प्राइवेट कैरियर टैक्सी के माध्यम से भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग दर्शन के लिए जा सकते हैं

ट्रेन मार्ग से भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग पहुंचने के लिए सबसे निकटतम रेलवे स्टेशन कर्जत रेलवे स्टेशन है जोकि भीमाशंकर से लगभग 168 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है इस रेलवे स्टेशन से आप बस या टैक्सी के माध्यम से भीमाशंकर पहुंच सकते है | 

सड़क मार्ग से भीमाशंकर जाने के लिए पुणे से आसानी से जुड़ा हुआ है पुणे से नियमित तौर पर बसे और टैक्सियों भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग के लिए चलाई जाती है| 

काशी विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग

काशी विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग 12 प्रमुख ज्योतिर्लिंगों में मुख्य स्थान रखता है यह ज्योतिर्लिंग भगवान शिव को समर्पित प्रसिद्ध हिंदू मंदिरों में से एक है भगवान शिव को समर्पित यह मंदिर विश्वेश्वर और काशी नरेश के नाम से भी जाना जाता है विश्वनाथ का अर्थ होता है “ब्रह्मांड के शासक”, ब्रह्मांड के शासक भगवान शिव को माना जाता है| 

काशी विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग कहां स्थापित है?

काशी विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग बनारस में वाराणसी में स्थित है जो उत्तर प्रदेश राज्य में पड़ता है इसका प्रमुख रूप से निर्माता महारानी अहिल्याबाई होल्कर को माना जाता है जिसे 1780 में स्थापित किया गया था| 

विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग की स्थापना और कथाएं

काशी विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग का इतिहास अत्यंत प्राचीन है यह अनादि काल से ही काशी में स्थित है यह स्थान शिव पार्वती का प्रमुख अधिष्ठान भी है इसे प्रथम लिंग माना गया है इसका महाभारत और अन्य उपनिषदों में भी हैं| 

11 वीं सदी में राजा हरिश्चंद्र ने इस विश्वनाथ मंदिर का जीर्णोद्धार कराया था परंतु 1194 ईस्वी में मोहम्मद गोरी ने इस मंदिर में लूटपाट करके से तोड़ दिया| 

इतिहासकारों के अनुसार इसे फिर से बनाया गया परंतु 1447 ईस्वी के आसपास सुल्तान महमूद द्वारा फिर से तोड़फोड़ की गई ईश्वर मंदिर को 1632 में भी तोड़ा गया इसके पश्चात भी अन्य ऐतिहासिक घटनाएं इस मंदिर से जुड़ी रहे |

पंजाब के महाराजा रणजीत सिंह ने इस मंदिर के लिए विशाल सोने का छत्र बनवाया ग्वालियर की महारानी भेजा भाई ने मंडप बनवाया महाराजा नेपाल में विशाल नदी की प्रतिमा बनवाई 1809 में एक विवाद हुआ जिसमें हिंदुओं ने मस्जिद पर कब्जा कर लिया इस पर एक विश्वव्यापी आंदोलन भी हुआ|

काशी विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग के पास के प्रमुख पर्यटन स्थल केंद्र 

बनारस में काशी विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग स्थित है इसके अलावा बनारस में अन्य दर्शनीय स्थल है जहां पर पर्यटक भारी संख्या में पहुंचते हैं उन प्रमुख स्थलों में अस्सी घाट ,दशाश्वमेध घाट,

तुलसी मनसा मंदिर, दुर्गा मंदिर, काशी विश्वनाथ मंदिर, मणिकर्णिका घाट, रामनगर किला ,चुनार का किला, सारनाथ मंदिर, आलमगीर मस्जिद, इसके अलावा बनारस सिल्क एंपोरियम जहां पर साड़ियों की अधिक संख्या में खरीद-फरोख्त का काम होता है| 

काशी विश्वनाथ कैसे पहुंचे ?

हवाई मार्ग से काशी विश्वनाथ के दर्शन करने के लिए बनारस हवाई अड्डा है जो कि विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग से केवल 20 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है यहां से दिल्ली मुंबई के नियमित उड़ानें चलती हैं

रेल मार्ग से काशी विश्वनाथ मंदिर जाने के लिए निकटतम रेलवे स्टेशन मंडुवाडीह रेलवे स्टेशन है इसके अलावा आप बनारस के रेलवे स्टेशन भी उतर सकते हैं जहां से प्राइवेट कैसे टैक्सी के द्वारा आप आसानी से आप हो सकते हैं

सड़क परिवहन से यहां आने के लिए बनारस से सभी प्रमुख शहरों की नियमित बसें चलती हैं


त्रयंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग 

त्रंयबकेश्वर ज्योतिर्लिंग महाराष्ट्र प्रांत के नासिक जिले में स्थित है यह गोदावरी गोदावरी नदी का उद्गम स्थल है यहां पर शिव भक्तों का तांता लगा रहता है यह गौतम ऋषि का स्थली भी है| गौतम ऋषि के तप  से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने यहां रहने का निश्चय किया | 

यह स्थान गोदावरी नदी का उद्गम स्थल भी है शिव भक्तों के लिए है यह स्थान अत्यंत पवित्र है यह पहाड़ी की तलहटी में स्थित है| 

त्रंयबकेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर कहां स्थित है ?

त्रंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर महाराष्ट्र राज्य के नासिक शहर में स्थित है यह ब्रह्मगिरि नामक गांव में पहाड़ी की तलहटी  में बना हुआ अत्यंत भव्य और प्राचीन मंदिर है| 

त्रंयबकेश्वर मंदिर की कथाएं और स्थापना

त्रंयबकेश्वर मंदिर की स्थापना काले पत्थरों से की गई है यह मंदिर निर्माण का अनूठा और अद्भुत संगम है इस मंदिर का निर्माण नाना साहब पेशवा ने 17 55 में कराया था परंतु यह 31 साल के लंबे अंतराल के बाद सन 1786 तक जाकर पूरा हुआ है| 

पुरातत्व विभाग के अनुसार इस मंदिर में उस समय लगभग 16 लाख रुपए खर्चा हुए थे जो आज के समय को देखते हुए अत्यंत अधिक राशि है| 

त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग का इतिहास एवं कथाएं 

त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग में कथा के अनुसार यह गौतम ऋषि की तपोभूमि थी अपने ऊपर लगे गौ हत्या के पाप को समाप्त करने के लिए उन्होंने भगवान शिव की कठोर तपस्या की थी उनकी कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव यहां पर अवतरित हुए और उन्हें गौ हत्या के पाप से मुक्त किया| 

गौतम ऋषि की अनुनय विनय के कारण शिवजी ने यहां पर रहना स्वीकार किया और अपने तीन नेत्रों वाले स्वरूप में यहां विराजमान हुए इसलिए जगह को त्रंयबकेश्वर अर्थात तीन नेत्रों वाले जगह कहा जाने लगा हर सोमवार को यहां पर त्रंयबकेश्वर के राजा अपनी प्रजा का हाल जानने के लिए नगर भ्रमण के लिए निकलते हैं| 

त्रंयबकेश्वर ज्योतिर्लिंग के पास के प्रमुख पर्यटन स्थल

त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग के अलावा नासिक में घूमने के लिए बहुत सारे प्रमुख पर्यटन स्थल है उनमें पांडवलेनी गुफाएं, मुक्तिधाम मंदिर, अंजनेरी पर्वत, सीता गुफा ,

पंचवटी, सिक्का संग्रहालय, सप्तश्रृंगी मुनि का आश्रम, कालाराम मंदिर, तोपखाना केंद्र ,राम कुंड ,नासिक आदि प्रमुख रूप से हैं

त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग नासिक कैसे पहुंचे ?

त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग वायु मार्ग से जाने के लिए निकटतम हवाई अड्डा मुंबई एयरपोर्ट है जो लगभग देश विदेश से आसानी से जुड़ा हुआ है परंतु सबसे नजदीकी एयरपोर्ट ओजार एयरपोर्ट है लेकिन यहां पर नियमित पुराने नहीं रहती हैं

रेल मार्ग द्वारा त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग आने के लिए निकटतम रेलवे स्टेशन नासिक रोड है जो मुंबई से अच्छी तरह से जुड़ा हुआ है

सड़क मार्ग  से त्रंबकेश्वर आने के लिए नासिक से केवल 30 किलोमीटर की दूरी तय करनी पड़ती है मुंबई पुणे औरंगाबाद जैसे महाराष्ट्र के बड़े शहरों से यह पूरी तरह से जुड़ा हुआ है ट्रैवल साधन द्वारा आसानी से यहां आ सकते हैं| 


वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग

झारखंड में स्थित देवघर में वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग स्थापित है यह ज्योतिर्लिंग भक्तों की संपूर्ण मनोकामना को पूर्ण करने वाला माना जाता है यहां पर वर्ष भर भक्तों की भीड़ रहती है| 

विशेषकर सावन के महीने पर यहां पर पूरे 1 महीने विशेष मेले का आयोजन किया जाता है यहां पर भक्तों की मुरादें पूर्ण होती है इसलिए इसे कामना लिंग भी कहा जाता है| 

बैजनाथ ज्योतिर्लिंग की स्थापना और कथाएं

यह सिद्ध पीठ देवताओं के द्वारा निर्मित किया गया है पौराणिक कथा के अनुसार राक्षस राज रावण हिमालय पर जाकर शिवजी की कठोर तपस्या की और उन्हें प्रसन्न कर अपने साथ लंका ले जाने की इच्छा जाहिर की शिव जी ने उसे अपने भेंट स्वरूप शिवलिंग भेज दी और कहा कि इसे किसी भी स्थान पर ना रखें और सीधा लंका पर ले जाकर स्थापित करें| 

शिव जी की आज्ञा अनुसार रावण उनके शिवलिंग को लेकर लंका के लिए चला परंतु रास्ते में उसे लघु शंका की अनुभूति हुई इसके पश्चात ने एक चरवाहे को पकड़ा कर लघुशंका के लिए गया| 

परंतु शिवलिंग का भार अधिक होने कारण बैजनाथ ने उसे जमीन पर रख दिया और शिव जी की कथा अनुसार वर्लिंग वहां से हिला डुला भी नहीं अंत में रावण हार कर उसे वहीं पर अंगूठे से दबा कर चला गया |

अन्य देवताओं ने यह देखा और वहां जाकर शिवजी की स्तुति की और वहीं पर उस शिवलिंग की प्राण प्रतिष्ठा कर दी इस प्रकार व स्वर्ग चले गए तब से लिंक भक्तों की आस्था का प्रमुख केंद्र है लोक मान्यता के अनुसार वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग सबकी मनोकामना को पूर्ण करने वाला माना जाता है| 

बैद्यनाथ जी की फोटो की जानकारी

बैजनाथ की पवित्र यात्रा

बैजनाथ धाम के लिए पवित्र यात्रा का शुभारंभ सावन महीने में होता है सबसे पहले यहां तीर्थयात्री सुल्तानगंज एकत्र होते हैं वहां अपने पात्रों में पवित्र गंगाजल को भरकर स्नान कर कर उसको अपनी अपनी कावर में रखकर बैजनाथ धाम और बासुकीनाथ के लिए प्रस्थान करते हैं |

रास्ते में जाते समय इस बात का विशेष ध्यान रखा जाता है कि यह जल्द कहीं भी भूमि से ना छूने पाए | 

यात्रा के दौरान सभी भक्त गण “बोल बम”बोल बम “जय बम “के नारे लगाते हुए आगे बढ़ते हैं और अनेक दुर्गम रास्तों को पार करते हुए अंत में देवघर पहुंचते हैं |

देवघर को देवों का घर भी कहा जाता है यह  पवित्र और प्राचीन मंदिर है इस मंदिर में भगवान शिव का ज्योतिर्लिंग के साथ-साथ पार्वती जी की भी मूर्ति विराजमान है इसके साथ-साथ कई छोटे-बड़े मंदिर भी मंदिर परिसर में ही बने हुए हैं| 

ज्योतिर्लिंग होने के साथ-साथ या 1 शक्ति पीठ है कि कि आप कहा जाता है कि यहां पर माता का हृदय गिरा था इसे हाद्र्पीठ भी कहा जाता है| 

 बैजनाथ बैजनाथ मंदिर परिषद में ज्योतिर्लिंग के अलावा 22 छोटे-बड़े प्रमुख और प्राचीन मंदिर स्थित है| 

बैजनाथ ज्योतिर्लिंग कैसे पहुंचे?

सड़क परिवहन से बैजनाथ ज्योतिर्लिंग जाने के लिए आसानी से चारों दिशाओं से बसें उपलब्ध हैं कोलकाता से या 373 किलोमीटर पटना से 281 किलोमीटर और रांची से 250 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है इन प्रमुख शहरों से बैजनाथ के लिए नियमित बसें उपलब्ध है

रेल माध्यम से बैजनाथ ज्योतिर्लिंग आने के लिए सबसे निकटतम रेलवे स्टेशन जसीडीह है या हावड़ा पटना दिल्ली लाइन पर बना हुआ रेलवे स्टेशन है यह रेलवे स्टेशन सभी प्रमुख शहरों से जुड़ा हुआ है जसीडीह से देवघर की दूरी मात्र 9 किलोमीटर है जसीडीह रेलवे स्टेशन के बाहर आपको बैजनाथ ज्योतिर्लिंग जाने के लिए ऑटो रिक्शा टैक्सी नियमित तौर पर मिलती है| 

हवाई मार्ग द्वारा बाबा बैजनाथ की यात्रा करने के लिए सबसे निकटतम हवाई अड्डा पटना है पटना से आप ट्रेन या टैक्सी से देवघर पहुंच सकते हैं पटना से देवघर की दूरी 285 किलोमीटर है| 


नागेश्वर ज्योतिर्लिंग

द्वारका में स्थित यह ज्योतिर्लिंग प्रमुख ज्योतिर्लिंगों में से एक है इस ज्योतिर्लिंग के बारे में कहा जाता है कि जो भी इस ज्योतिर्लिंग की पूजा-अर्चना करता है वह समस्त पापों से मुक्त होकर भगवान शिव के धाम को चला जाता है यह पवित्र धाम भक्तों की आस्था का बहुत बड़ा केंद्र है

नागेश्वर ज्योतिर्लिंग कहां स्थित है?

नागेश्वर ज्योतिर्लिंग भगवान शिव को समर्पित ज्योतिर्लिंग है यह ज्योतिर्लिंग द्वारका नगरी में गुजरात राज्य के बाहरी क्षेत्र में स्थित है यह स्थान द्वारकापुरी से लगभग 18 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है| 

नागेश्वर ज्योतिर्लिंग की स्थापना और कथाएं

इस प्राचीन ज्योतिर्लिंग के विषय में पुराणों में भी कथा वर्णित है जो इस प्रकार है शुभ प्रिय नामक एक बहुत धर्मात्मा और सदाचारी वैश्य थे वह नित्य शिवपूजन और भक्ति में लगे रहते थे |

उनकी शिव भक्ति को देखकर एक दारूका नामक राक्षस बहुत क्रोधित रहता था उसे किसी भी भगवान की पूजा अच्छी नहीं लगती थी वह निरंतर कोशिश किया करता था कि वह इन सब पूजा पाठ करने वालों को समाप्त कर सके| 

एक बार सुप्रिया नौका पर सवार होकर कहीं जा रहे थे यह अवसर देखकर उस राक्षस ने उस नौका पर आक्रमण कर लिया और उन्हें पकड़ कर अपनी राजधानी में ले जाकर जेल में डाल दिया परंतु जेल में भी वह नित्य भगवान की पूजा आराधना करने लगे इसके अलावा जेल में बंद बंदियों को भी शिव पूजन के लिए प्रोत्साहित करने लगे| 

जब यह समाचार सुना दारू अपने तो अत्यंत क्रुद्ध हो गया और कारागार में आ गया इस दौरान प्रिय  भगवान् शिव के चरणों में ध्यान लगा कर बैठा था और अपनी दोनों आंखें बंद किए थे यह देखकर दारू अत्यंत क्रोधित हो गया| 

 उसने शिव भक्ति करने वाले सभी कैदियों और सुप्रीम को भी मार डालने का आदेश जारी कर दिया परंतु यह आदेश सुन कर भी भयभीत नहीं हुआ वह एकाग्र मन से अपनी शिव पूजा करता रहा |

क्योंकि उसे विश्वास था किशिव उसे कोई नुकसान नहीं होने देंगे उसकी उसकी पूजा से प्रसन्न होकर स्वयं भगवान शिव एक ऊंचे स्थान पर ज्योतिर्लिंग के रूप में प्रकट हो गए और सुप्रिया को अपना पाशुपतास्त्र भी प्रदान कर दिया| 

और इससे राक्षस दारूका वध हुआ अंत में सुप्रिया शिवधाम को चले गए भगवान शिव के आदेश के अनुसार ही इस स्थान का नाम नागेश्वर ज्योतिर्लिंग पड़ा| 

नागेश्वर ज्योतिर्लिंग कैसे पहुंचे?

सड़क परिवहन से नागेश्वर ज्योतिर्लिंग आने के लिए यह द्वारिकापुरी गुजरात से लगभग 25 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है जहां आप आसानी से द्वारकापुरी से आ सकते हैं| 

रेल परिवहन से नागेश्वर ज्योतिर्लिंग आने के लिए निकटतम रेलवे स्टेशन द्वारका रेलवे स्टेशन है जो अहमदाबाद ओखा ब्रॉड गेज रेलवे लाइन पर स्थित है या सूरत बड़ोदरा कर्नाटक मुंबई केरल जैसे शहरों से आसानी से जुड़ा हुआ है| 

हवाई मार्ग से यहां पहुंचने के लिए निकटतम हवाई अड्डा जामनगर स्थित है जामनगर हवाई अड्डे से इस ज्योतिर्लिंग 135 किलोमीटर की दूरी है मुंबई से जामनगर की नियमित उड़ानें उपलब्ध है| 


रामेश्वरम ज्योतिर्लिंग

रामेश्वरम ज्योतिर्लिंग द्वादश ज्योतिर्लिंग में से एक माना जाता है इसके बारे में कहा जाता है कि उत्तर में काशी की जो मान्यता है वही दक्षिण में रामेश्वरम की है यह स्थान चेन्नई से लगभग सवा मील दूर स्थित है| 

इसका आकार एक सुंदर शंख के समान है वर्तमान समय में एक टापू बन चुका है इसे रामनाथ स्वामी मंदिर भी कहा जाता है| 

रामेश्वरम ज्योतिर्लिंग कहां है?

रामेश्वरम ज्योतिर्लिंग रामेश्वर शहर में तमिलनाडु राज्य में स्थित है द्रविड़ वास्तुकला का बना हुआ यह अनूठा उदाहरण है| 

रामेश्वर ज्योतिर्लिंग की स्थापना एवं कथाएं

अति प्राचीन मंदिर की स्थापना लंका के राजा पराक्रम बाबू के द्वारा की गई थी बाद में इसका जीर्णोद्धार रामनाथपुरम के राजा उद्यान सेतुपति के द्वारा की गई थी सनी 1173 ईस्वी में इस मंदिर की स्थापना की गई यह मंदिर भारतीय निर्माण कला सेप्पला का एक उत्कृष्ट नमूना है इसका प्रवेश द्वार लगभग 45 फीट ऊंचा है| 

इस विषय में एक रोचक कथा यह है कि रामेश्वरम विख्यात मंदिर की स्थापना श्री राम जी ने की थी जब सीता जी को छुड़ाने के लिए राम ने लंका पर चढ़ाई की तो उन्होंने बिना युद्ध किए सीता जी को छुड़वाने के बहुत प्रयत्न किए परंतु हर बार वह असफल रहे |

इसके लिए उन्होंने वानर सेना सहित  सागर को पार करना उचित समझा  इसके पश्चात उन्होंने इस पर एक बांध सेतु बनाने का निर्णय लिया |

इस कार्य सिद्धि के लिए भगवान शिव की आराधना की और समुद्र के किनारे रेत से शिवलिंग का निर्माण किया विधिवत पूजन करने के पश्चात लंका पर चढ़ाई करने में सफल रहे |

और अंत में रावण को मारकर सीता जी को मुक्त कराया वापस लौटकर उन्होंने इस शिवलिंग की विधिवत स्थापना की और इसे श्री रामेश्वरम की उपाधि प्रदान की| 

रामेश्वरम ,मंदिर की जानकारी

रामेश्वरम ज्योतिर्लिंग के पास के अन्य पर्यटन स्थल

रामेश्वर ज्योतिर्लिंग के करीब कई अन्य महत्वपूर्ण तीर्थ स्थल हैं जिनमें देवी मंदिर, सेतू माधव, 22 कुंड तीर्थम, बिल्ली रानी तीर्थ, एकांत रामतीर्थ ,को दंड स्वामी मंदिर ,सीताकुंड, आदि सेतु ,राम सेतु आदि प्रमुख रूप से हैं

रामेश्वरम ज्योतिर्लिंग कैसे पहुंचे?

रेल साधन से रामेश्वरम ज्योतिर्लिंग जाने के लिए सबसे निकटतम स्टेशन रामेश्वरम शहर में है परंतु यहां पर डायरेक्ट सुविधा उपलब्ध नहीं है अन्य शहरों से जोड़ने के लिए मदुरई रेलवे स्टेशन एक अच्छा विकल्प होता है जहां से लगभग अधिकतर ट्रेन रामेश्वरम होते हुए जाती है |  

सड़क मार्ग से रामेश्वरम ज्योतिर्लिंग जाने के लिए आपको रामेश्वरम शहर से अन्य सभी प्रमुख शहरों के लिए बस से उपलब्ध हैं|


 

घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग

 घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग भारत के 12 प्रमुख ज्योतिर्लिंगों में से 12 स्थान पर है यह भगवान शिव को समर्पित है यह प्राचीन मंदिर तेरहवीं शताब्दी के आसपास का बनाया हुआ है यह एलोरा की गुफाओं के एकदम निकट स्थित है इसे गणेश्वर मंदिर के नाम से भी जाना जाता है यह स्थान भगवान शिव के चमत्कारी कथा से जुड़ा हुआ है यहां हजारों की संख्या में सावन में लोग दर्शन करने आते हैं| 

 घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग कहां स्थित है?

ज्योतिर्लिंग महाराष्ट्र राज्य के औरंगाबाद जिले में एलोरा की गुफाओं के पास स्थित है| 

घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग की स्थापना एवं कथाएं

इस मंदिर का इतिहास काफी पुराना है समय-समय पर मुगलों द्वारा इस मंदिर को क्षतिग्रस्त किया गया परंतु इसके साथ-साथ इसका पुनर्निर्माण भी होता रहा अंत में इसका पुनर्निर्माण अहिल्याबाई होल्कर ने कराया था इस मंदिर की संरचना भारतीय वास्तुकला से अभिभूत है घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग लाल पत्थरों से बनाया गया है इसका निर्माण लगभग 44000 वर्ग फुट में किया गया है| 

घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग की स्थापना एवं कथाएं 

इस मंदिर के निर्माण के पीछे एक प्राचीन कथा यह  है कि सुधर्मा सुधा पति पत्नी अपना जीवन यापन कर रहे थे परंतु वैवाहिक जीवन में उन्हें संतान सुख नहीं हो रहा था सुधा कभी मां नहीं बन सकती इसलिए सुदया ने अपनी छोटी बहन सुषमा के साथ अपने पति सुधर्मा का विवाह करवा दिया \

धीरे-धीरे समय व्यतीत होने लगा औरकुष्मा  के गर्भ से एक खूबसूरत बालक ने जन्म लिया परंतु धीरे-धीरे यह सब देख कर सुधर्मा के मन में ईर्ष्या उत्पन्न होने लगी इस ईर्ष्या स्वरूप उसने कुष्मा  के पुत्र को उसी सरोवर में डूबा दिया जिस सरोवर में घोषणा रोज शिवलिंग को को विसर्जन किया करती थी| 

कुसमा जो कि परम शिव भक्ति और प्रतिदिन 101 शिवलिंग का निर्माण कर के विधिवत पूजन करने के पश्चात उस सारे व में उनसे उन लोगों को विसर्जित किया कर देती थी यह सब सुनकर पूरे क्षेत्र में हाहाकार मचने लगा परंतु कुसमा अपने पूजन कार्य में लगी रही पूजन करने के पश्चात उसने देखा कि उसका पुत्र सरोवर से जिंदा बाहर निकल आया है| 

और इसके साथ ही भगवान शिव भी प्रकट हो गए वह बहुत क्रोधित थे वह सुधर्मा को श्राप देना चाहते थे परंतु  कुष्मा ने शिव जी से विनती की कि वो उसे कोई नुकसान ना पहुंचाएं और जनकल्याण के लिए यहां पर निवास करने का आग्रह किया| 

कुष्मा की विनती शिवजी ने स्वीकार कर ली और यहां ज्योतिर्लिंग के रूप में विराजमान हुए| 

  घृष्णेश्वर मंदिर जाने के लिए सबसे अच्छा समय

घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर भ्रमण करने के लिए सबसे अच्छा समय नवंबर से मार्च तक का माना जाता है क्योंकि यहां पर तापमान लगभग सामान्य होता है| 

वैसे तो प्रत्येक शिव मंदिर में सावन का महीना विशेष खास होता है यहां पर सावन के महीने में भी काफी अधिक संख्या में भक्त इस ज्योतिर्लिंग के दर्शन करने के लिए आते हैं| 

घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग के आसपास के प्रमुख पर्यटन स्थल

घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग के पास के प्रमुख पर्यटन स्थलों में अजंता की गुफाएं, एलोरा की गुफाएं ,बीवी का मकबरा ,दौलताबाद किला, बौद्ध गुफाएं, सलीम अली जी, जैन गुफाएं, पंचायती खुल्दाबाद ,औरंगाबाद कैलाश मंदिर, जामा मस्जिद ,सोनेरी महल ,आदि प्रमुख पर्यटन स्थल आदि | 

घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर का खुलने और बंद होने का समय

 घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर प्रातः 5:30 बजे खुल जाता है और शाम को 9:00 बजे बंद किया जाता है| 

हालांकि सावन के महीने में अगस्त से सितंबर के बीच में सुबह 3:00 बजे ही खोल दिया जाता है और रात के 11:00 बजे तक भक्त यहां ज्योतिर्लिंग के दर्शन कर सकते हैं| 

घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग कैसे पहुंचे?

हवाई मार्ग से घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग पहुंचने के लिए सबसे निकटतम हवाई अड्डा औरंगाबाद है जो घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर से केवल 30 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है आप यहां से बस या टैक्सी की मदद से इस मंदिर पर आसानी से पहुंच सकते है | 

ट्रेन से घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग जाने के लिए सबसे निकटतम रेलवे स्टेशन औरंगाबाद रेलवे स्टेशन है या देश के प्रमुख रेलवे स्टेशनों से बहुत आसानी से जुड़ा हुआ है कालेश्वर ज्योतिर्लिंग की दूरी यहां से लगभग 30 किलोमीटर की है| 

सड़क परिवहन से अगर आप यह ज्योतिर्लिंग जाना चाहते हैं तो औरंगाबाद बस स्टैंड से एलोरा गुफा के लिए नियमित बसें चलती हैं एलोरा गुफा के पास ही यह ज्योतिर्लिंग स्थित है| 


द्वादश ज्योतिलिंग की फोटो 

 

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